जमुना किनारे मोरी ऊँची हवेली मैं बिरज की गोपिका नवेली, राधा रंगीली मोरो नाम-सांवरा आ जाइयो

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– मुम्बई विश्वविद्यालय में म्यूजिक विभाग की अस्सोसिएट प्रोफेसर-किराना घराना की डॉ चेतना बनावत ने दी शास्त्रीय व लोक संगीत की प्रस्तुतियां
जोधपुर।
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के तत्वावधान में आयोजित छः दिवसीय अखिल भारतीय संगीत समारोह का समापन मुम्बई विश्व विद्यालय में संगीत विभाग की अस्सोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ चेतना बनावत की शास्त्रीय व् सुगम संगीत प्रस्तुति के साथ हुआ।
डॉ बनावत ने इस दौरान राग सरस्वती, मधुकौस, दादरा, खमाज और भैरवी के साथ ही मांड की भी प्रस्तुति दे कर श्रोताओं को अभिभूत कर फिया।
बनस्थली विद्यालय में संगीत विषय में पीजी व पीएचडी करनेवाली उदयपुर मूल की डॉ बनवात ने किराना घराना की गायिका पद्म भूषण प्रभा अत्रे से शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की । अपनी गुरु अत्रे की ही शैली में गायन करने वाली डॉ बनावत ने कार्यक्रम की शुरुआत राग सरस्वती में प्रस्तुत ख्याल  के साथ की। उन्होंने अलाप, आरोह व अवरोह सहित गमक के साथ जागो हे जगमाता , न करो विलम्ब बोल में बड़ा ख्याल की प्रस्तुति दी जबकि एकताल में निबद्द छोटा ख्याल की प्रस्तुति करते हुए  मात सरस्वती देवी की स्तुति पेश की। अगली प्रस्तुति के रूप में डॉ बनावत ने राग मधुकौन्स में रचना माने ना माने ना, कान्हा मोरी बतियाँ माने ना की प्रस्तुति करते हुए श्रोताओं से दाद पायी।
मांड की प्रस्तुति दी
इस दौरान उन्होंने मांड की भी प्रस्तुति करते हुए म्हारा सांचौड़ा मोती, म्हारा मूंगोड़ा मोती हालो तो ले चालूं मरुधर देश की प्रस्तुति कर श्रोताओं से एक बार फिर दाद पायी।
दादरा की प्रस्तुति रही प्रभावशाली
डॉ बनावत ने दादरा में प्रस्तुति देते हुए परंपरागत बृजभाषा के गीत जमुना किनारे म्हारो गांव, सांवरा आ जाइयो, जमुना किनारे मोरी ऊँची हवेली मैं बिराज की  गोपिका नवेली, और राधा रंगीली मोरो नाम की प्रस्तुति कर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया। उन्होंने बाद में राग भैरवी की भी प्रस्तुति दी। डॉ बनावत के साथ तबले पर मनीष मदनकर ने तथा तानपूरे पर अर्चना ने संगत की । आरम्भ में अकादेमी सचिव महेश पंवार ने कलाकारों का स्वागत किया। संचालन प्रमोद सिंघल ने किया।