video- लंदन के बाद जोधपुर में स्थित है ऐसी घड़ी, घंटाघर के बारे में यह जानते है आप ?

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१९११ में लंदन की कम्पनी को एक लाख दिए थे ताकि दूसरी घड़ी  नहीं बने। राजा सरदारसिंह के शासन काल में बना था घंटाघर

जोधपुर. शहर का हेरिटेज मार्केट सरदार मार्केट स्थित घंटाघर में लगी घड़ी के टंकोरे हर १५ मिनट में बजते हैं। इसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है। मार्केट सहित आस-पास के लोग समय के लिए घड़ी के बजने वालें टंकोरों के ही भरोसे रहते है। घंटाघर की यह घड़ी विश्वस्तर पर अपने आप में मात्र एक ही है।  इसकी दूसरी  अनुकृति नहीं बनाने के लिए तत्कालीन राजा ने घड़ी बनाने वाली कंपनी को एक लाख रूपए दिए थे। घड़ी की खास बात यह है कि इसके चार डायल है जो कि एक मशीन के विभिन्न यांत्रिक पुर्जो से जुडे है एक साथ चलते है। यह घड़ी फनर से नहीं चलती । साथ ही समय बताने के लिए बजने वाले टंकोरे की  आवाज हर बार अलग-अलग निकलती है।

सौ फुट ऊंचा बनावाया घंटाघर, ३ लाख रूपए में लगाई घड़ी सरदार मार्केट १९१०  में राजा सरदारसिंह के शासनकाल में नई मंडी के पास बना था। इस मार्केट की आकृति चौपड़ की तरह रखी गई थी। मार्केट बनने के बाद इसके बीचों बीच सौ फुट ऊंचे घण्टाघर का निर्माण करवाया। घण्टाघर में घड़ी लगवाने के लिए लंदन की लुण्ड एंड ब्लोकली कम्पनी को ऑर्डर दिया व उस समय ३ लाख रूपए घड़ी पर खर्च किए।

एक लाख रूपए घड़ीं की कीमत थी, एक लाख रूपए इस घड़ी को लंदन से जोधपुर लाने व लगाने के खर्च हुए व एक लाख रूपए कम्पनी को इस बात के दिए गए कि वह एेसी दूसरी घड़ी नहीं बनाए । तीन मोटे तार पर लटके भार से चलती है घड़ीघंण्टाघर  की मीनार में ऊपर की तीन मंजिलों में यह घड़ी लगी हुई हैं। दिखने में साधारण घड़ी की तरह है लेकिन यह साधारण घड़ी की तरह फनर से नहीं चलती इसे चलाने के लिए तीन मोटे तारों में अलग-अलग ठोस लोहे के तीन भार लटके हुए है।

जैसे-जैसे यह घड़ी चलती है ये तीनों भार धीरे-धीरे नीचे की ओर आते है और एक सप्ताह में यह तीनों भार पूरे नीचें आ जाते है। सप्ताह के प्रत्येक शुक्र वार को इस घड़ी में चाबी भरी जाती हैं। चाबी का वजन १० किलो है।  चाबी भरने पर तीनों भार ऊपर पहुंच जाते है। इन तीनों भरों में एक भार १५ मिनट का है, जिसका वजन दो क्विंटल है। दूसरा भार आधा घंटे का है जिसका वजन १ क्विंटल है।

तीसरा भार एक घंटे का है जिसका वजन सवा क्विंटल है। चौथी मंजिल पर लगे विशालकाय घंटों से आती है आवाजतीसरी मंजिल पर  स्थित घड़ी के यांत्रिक कक्ष में दो बड़ें लोहे के गर्डर पर यह घड़ी स्थित है। इसकी लम्बाई ६ फुट और चौड़ाई  २ फुट है। यही घड़ी का पेंडुलम लगा हुआ है जिसका वजन ५० किलों है। घंटाघर के चारों दिशाओं में लगे डायलों का व्यास ६ फुट है। इसमें बड़ी सूई३ फुट एवं छोटी सूई २ फुट की है।

घड़ी का डायल सफेद कांच का है। डायल पर कुछ जगह मरम्मत के बाद वहां कांच की जगह सफेद प्लास्टिक लगाया गया। घंटाघर की तीन मंजिल तक जाने के लिए पक्की सीढीयां बनी है। लेकिन चौथी मंजिल पर जाने के लिए लोहे की सीढीयां लगी है। चौथी मंजिल पर सात धातु के दो विशालकाय घ्ांटे दो मोटे गार्डरों से लटके हुए है।

इन विशालकाय घंटों पर तीन हथौड़े लगे है जो पांच-पांच किलों के है। यह हथौड़े जब घंटे पर पड़ते है तो टंकोरों की आवाज आती है जो समय बताती है। प्रत्येक १५ मिनट में हथौड़ा घंटे पर पड़ता है और टंकोरा बजता है। हर १५ मिनट पर २ टंकोरे, आधा घंटे पर ४ टंकोरे, पौन घंटे में ६ टंकोरें व एक घंटा होने पर ८ बार टंकोरे बोलते है। इसके बाद समय बताने के लिए जितना समय हुआ उतने टंकोरे बजते है। बड़ी विशेषता यह है कि हर टंकोरे की आवाज अलग-अलग आती है।