याचिकाकर्ता को वरिष्ठ अध्यापक भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश स्नातक प्रथम व द्वितीय वर्ष की अंकतालिका प्रस्तुत नहीं करने के कारण किया था वंचित

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जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान लोक सेवा आयोग की ओर से
आयोजित वरिष्ठ अध्यापक (विशेष शिक्षा) भर्ती में स्नातक प्रथम व द्वितीय वर्ष की
अंकतालिका प्रस्तुत नहीं करने के कारण नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर करने को
अनुचित माना है। न्यायाधीश अरुण भंसाली ने ऐसे ही एक मामले में दायर रिट
याचिका पर प्रारम्भिक सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को काउंसलिंग
प्रक्रिया में शामिल करने के अंतरिम आदेश दिए हैं।
याचिकाकर्ता जोधपुर निवासी सुरेश की ओर से अधिवक्ता परवेज मोयल ने
न्यायालय को बताया कि आरपीएससी ने वरिष्ठ अध्यापक (विशेष शिक्षा) भर्ती में
विज्ञान विषय के लिए 34 पदों के लिए विज्ञप्ति जारी की थी। याचिकाकर्ता ने
परिणाम के बाद वरीयता सूची में तीसरा स्थान अर्जित किया, लेकिन उसे संभाग
आवंटन प्रक्रिया से इस आधार पर बाहर कर दिया कि उसने बी.एससी. प्रथम व
द्वितीय वर्ष की अंकतालिका प्रस्तुत नहीं की थी। प्रारम्भिक सुनवाई के बाद
न्यायालय ने शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव, आरपीएससी सचिव और शिक्षा
निदेशक को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने का आदेश दिया
और तब तक याचिकाकर्ता को काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल करने का अंतरिम
आदेश दिया।

 

संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं करने पर डीजीपी सहित कई
अधिकारियों को नोटिस
बीकानेर के जयनारायण व्यास कॉलोनी पुलिस थाने का मामला:
हाईकोर्ट ने दो सप्ताह में मांगा जवाब
जोधपुर। संज्ञेय अपराध की लिखित इत्तला पर भी एफआईआर दर्ज नहीं करने के
मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस
महानिदेशक सहित कई पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
न्यायाधीश डॉ. पुष्पेन्द्रसिंह भाटी की एकलपीठ ने लोक अभियोजक को नोटिस
थमाते हुए दो सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
बीकानेर निवासी सुनीता दीक्षित की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता
गोवर्धन सिंह, रजाक के. हैदर व प्रमेश्वर पिलानिया ने एकलपीठ आपराधिक
रिट याचिका दायर कर कहा कि उन्होने बीकानेर शहर के पुलिस थाना
जयनारायण व्यास कॉलोनी के थानाधिकारी को 12 अक्टूबर, 2018 को दण्ड
प्रक्रिया संहिता की धारा 154 (1) के तहत भारतीय दण्ड संहिता की धारा 166-ए, 120-बी

के अपराध को दर्शाने वाली संज्ञेय अपराध की लिखित इत्तला दी थी। जिस पर
थानाधिकारी ने एफआईआर दर्ज नहीं की। इसके बाद याचिकाकर्ता ने दण्ड
प्रक्रिया संहिता की धारा 154 (3) के तहत पुलिस अधीक्षक और सपठित धारा 36 के तहत
पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अपराध), अतिरिक्त पुलिस
महानिदेशक (सतर्कता) और पुलिस महानिरीक्षक बीकानेर रेंज को भी लिखित
इत्तला भेजी, लेकिन फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
संज्ञेय अपराध की लिखित इत्तला दर्ज नहीं करने पर पुलिस अधिकारियों के
खिलाफ राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 31 के तहत अनुशासनात्मक
कार्यवाही कर उसके सेवा अभिलेख में अभिलिखित करने का प्रावधान है। इस मामले
में पुलिस अधिकारियों पर यह कार्रवाई किया जाना आवश्यक है। प्रारम्भिक
सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, पुलिस
महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अपराध), अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक
(सतर्कता), पुलिस महानिरीक्षक बीकानेर रेंज, पुलिस अधीक्षक बीकानेर और
थानाधिकारी सहित अन्य उच्चाधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब पेश
करने का आदेश दिया।
24 घण्टे में दर्ज होनी चाहिए एफआईआर
देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने ललिता कुमारी बनाम
स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश व अन्य के अहम न्यायिक दृष्टांत में संज्ञेय अपराध की
लिखित इत्तिला मिलने पर 24 घण्टे के भीतर एफआईआर दर्ज करने के साफ
निर्देश दे रखे है। इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज नहीं करने
वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ अनिवार्य रूप से कार्रवाई करने को भी कहा
है। इतना ही नहीं एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ
राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 31 के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही
कर उसके सेवा अभिलेख में अभिलिखित करने का भी प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह नहीं
अधिवक्ता रजाक के. हैदर ने उच्च न्यायालय को बताया कि संज्ञेय अपराध की
इत्तिला पर तत्काल एफआईआर दर्ज करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की
पालना में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा ने 30 जुलाई, 2018 को
परिपत्र जारी कर इस सम्बन्ध में विस्तृत निर्देश दे रखे हैं कि प्रत्येक संज्ञेय
अपराध की प्राप्त इत्तिला पर तत्काल अभियोग पंजीबद्ध किया जाए तथा संज्ञेय अपराध
की इत्तिला पर अभियोग पंजीबद्ध करने में असफल रहने वाले संबंधित पुलिस थाने
के भारसाधक अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही आवश्यक रूप से की
जाए। लेकिन पुलिस को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और डीजीपी के निर्देशों दोनों
की परवाह नहीं है।